माननीयों से लेकर महोदयों तक धनलक्ष्मी की विशेष कृपा?

News Desk
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पद रसूख और चेहरे की लालिमा जनसेवकों की कर्तव्यंनिष्ठा दर्शाती है.. गणतंत्र दिवस विशेष।
। शीर्षक का आशय संभवतः जनमानस के मन मस्तिष्क पर जो भाव प्रदर्शित कर रहा है, शायद उचित ही होगा, क्योकि जागरूक मतदाता अर्थात चुनावी भगवान चाहे विधानसभा हो, लोकसभा हो, चाहे पार्षद हो, या चाहे पंचायत चुनाव हो, सभी में बड़े उत्साह से जनप्रतिनिधि को चुनती है, लेकिन हाय री विडंबना वही जनप्रतिनिधि जो चुनावी बयार में जनमानस के चरण धोकर पीते है, एकाएक पद प्राप्ति के बाद सहज नहीं रह जाते। साथ ही जनसेवा के नाम का ढोल पीटकर ढोल की पोल से आय के स्त्रोत में दिनों दिन वृद्धि करने में तल्लीन हो जाते है। अब सीधी सी बात है कि जब माननीय भर कटोरा मलाई खायेंगे तो महोदय लोग तो उच्च शिक्षित होने का लाभ उठाकर माननीयों को सेवाकर देकर स्वयं भी मलाई का लुत्फ उठाने में पीछे थोड़ी रहेंगे?
मुद्दे की बात पर आते है ​कि, जैसा कि शीर्षक में उल्लेखि्त है कि माननीय और महोदयों पर धनलक्ष्मी की विशेष कृपा, तो ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वर्तमान में राजनीति जनसेवा के भाव से कोशों दूर होती जा रही है। अपितु निज लाभ और पद रसूख के चलते निजसेवा का माध्यम बन चुकी है, हास्यदपद ही कहेंगे कि सियासत के पदासीन सियासी मंचों से बड़ी—बड़ी लाभकारी योजनाओं का संखनाद करते है जो जनहित में दर्शाई जाती है। किंतु इन योजनाओं के क्रियान्वय में लगने वाली अच्छी खासी धनराशि का हिस्सा पहले ही जनमानस के शुभचिंतक जनसेवक जनप्रतिनिधि निर्धारित कर लेते है। शब्द कटु है पर सोलह आने सत्य है, स्वाभाविक है कि जब जनप्रतिनिधि अपना अधिभार शुल्क नियत करेंगे तो संबंधित विभाग के बुद्धिजीवी अधिकारी भी निज राजस्व पर विशेष ध्यान देंगे? विडंबना ही कहेंगे कि एक तरफ तो भ्रस्टाचार मुक्त भारत और प्रदेश की बात होती है तो वहीं सियासत के गलियारों से प्रशासन के गली कुछों में पद आसीन माननीय व महोदय अथाह धनसम्पत्ति के मालिक है। हालांकि वो बात अलग है कि जगजाहिर होने के बाद भी इन महानुभावों पर वक्रदृष्टि करने का साहस किसी में नहीं है या ये कह ले कि हमाम में सब नग्न है?
वहीं ये भी देखा जा रहा है कि आप प्रमुख केजरीवाल की ही तर्ज पर मुफ्त रेवड़ी बांटने की परंपरा सियासत में सिरमौर बन चुकी है, जिसके परिणाम स्वरूप प्रदेश कर्ज के बोझ में दबे जा रहे है लेकिन इन सियासी महारथियों को सिर्फ सत्ता सुख की भूख प्रबल है, बाकी भविषयतः होने वाले दुष्परिणामों की परवाह देख के भी अनदेखी की जा रही है। दुखद कहे या चिंतनीय कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भी आयोजन में खर्च शासकीय राशि में भी जमकर बंदरबांट होती है? खैर जनता तो जनार्दन है सब जान कर भी जय जयकार करती ही रहेगी।

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