जबलपुर (नवनीत दुबे)दुर्भाग्य कहे या विडंबना के वर्तमान में जो माहौल चल रहा है वह हिंदुस्तान की स्वर्णिम छबि को कलंकित करने का कृत्य कर रहा है,जातिभेद की खाई को कुछ सियासी लकड़बघहे दिन ब दिन गहरा करने का भरसक प्रयास कर रहे है ?सर्वविदित है बड़े बड़े राजनीतिक मंचो ओर सामाजिक जातिवादी मंचो से अलगाव की आग फैलाने का प्रयास हो रहा है,जिसमे स्वर्णो को विशेषकर ब्राम्हण ओर ठाकुरों को निशाना बनाया जा रहा है और इनके खिलाफ कुंठित मानसिकता से परिपूर्ण बुद्धिविहीन अभद्र भाषा शैली ,तुच्छ स्तर की बाते करके निम जाति के जनमानस के मस्तिष्क में जहर घोल रहे है ,निम्न जाति लिखने का आशय ये कदापि नही के किसी समाज को छोटा कहा जा रहा हो ,आशय सिर्फ इतना है ये लोग स्वयं को सार्वजनिक तौर पर छोटा दर्शाते हैं ,ओर जातिगत भेदभाव की बात करते है ,साथ ही इनके सियासती आका वोट बैंक की राजनीति के चलते अपने इशारों पर नचाते है,
विडंबना ही कहेंगे के सिर्फ हिंदुस्तान ही एक ऐसा देश है जहाँ आरक्षण की मलाई भर भर के खिलाई जाती है और स्वर्ण-हरिजन की परिधि नियत की जाती है और राजनीतिक दल इसी विभाजन के आधार पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते है जिसका खामियाजा ऊंच नीच के भेदभाव के रूप में दर्शाया जाता है ?मुद्दे की बात पर आते है आखिर ऐसी कौंन सी घुट्टी इन आरक्षण का लाभ लेने वालों ने पी रखी है जो हर क्षेत्र में आरक्षण की बैशाखी से आगे बढ़ रहे है और खुद को समाज की मुख्यधारा से अछूता बताकर ब्राम्हण,ठाकुरों को कोसते है गाली देते है जबकि सत्यता यही है के आरक्षण नीति के चलते स्वर्ण दुर्भाव का शिकार हो रहा है और आरक्षण लाभार्थियों को मिलने वाले सरकारी लाभ के चलते ठगा जा रहा है ?वर्तमान में जिस तरह से जाति भेद की राजनीति का बोलबाला हो रहा है और खुले सार्वजनिक मंचो से हरिजनों की सभाओं में ब्राम्हण ठाकुरों को अपशब्द कहे जा रहे है उसे देखते हुए अब यही मांग उठ रही है के ऐसे लोगो पर कानून का शिकंजा कसा जाय और स्वर्णो के लिए भी एक आयोग का गठन हो, जिससे झूठे मुकदमों, अपशब्दों का प्रयोग करने वालो पर नकेल कसी जा सके ,साथ ही आरक्षण की नीति में भी अब बदलाव होना आवश्यक है,क्योकि अब जातिभेद की आग सियासती लाभ लेने राजनीतिक दल लगा रहे है जबकि वास्तविकता की धरा पर ये अवधरणा लुप्त सी हो गई है ।
